पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम:ईर्ष्या और तुलना भी हमारे लिए लाभकारी हो सकती हैं
हर मनुष्य भीतर से कहीं ना कहीं ईर्ष्यालु होता है। ईर्ष्या की शुरुआत होती है तुलना से। तुलना शब्द तौल से बना है। जब हम तराजू के एक पलड़े में खुद को रखते हैं, दूसरे में दूसरों को और ना